क्या पता था। 

​उसके शहर को मैंने अपना बनाया,

क्या पता था उसका अपना कोई दूसरा शहर बन जाएगा। 

उसके अंधेरों को मैंने अपना बनाया, 

क्या पता था उसका उजाला कोई और बन जाएगा। 

उसके चेहरे को मैंने आईना बनाया, 

क्या पता था उसका आईना कोई और बन जाएगा। 

उसको गले लगा कर उसका ग़म चुराया, 

क्या पता था उसकी ख़ुशी की वजह कोई और बन जाएगा। 


उसके इश्क़ को मैंने अपना ख़ुदा बनाया, 

क्या पता था उसका ख़ुदा कोई और बन जाएगा। 

उसकी इबादत में ख़ुद को उसके हवाले किया, 

क्या पता था उसकी इबादत की वजह कोई और बन जाएगा।

उसके इक़रार का मैंने इन्तज़ार किया, 

क्या पता था उसका इक़रार कोई और बन जाएगा। 

मैंने सही वक़्त को आने का वक़्त दिया, 

क्या पता था मेरा वक़्त ही एक दिन बदल जाएगा।

✍️Sandeep Joshi✍️

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शब्दों का जंजाल

क्या होता अगर शब्द ना होते,
किस तरह बातों के सिलसिले शुरू होते,
दिल की बातें एक-दूसरे को भला कैसे कहते,
खत लिख कर दूरियों को कम कैसे करते।

पर शायद ये शब्द ना होते तो इनसे बने
धर्म-जात भी ना होते,
धर्म के नाम पर ना ये झगड़े होते,
ना इन्सानों के ये कत्लेआम होते।

ना हिंदू होते ना मुसलमान होते,
ना सिख होते ना ईसाई होते,
बेशक हम बेनाम होते पर कम से कम इंसान होते,
ना लड़ाई ना झगड़े और ना शब्दों के वार होते।

शब्दों के इस जंजाल ने फसा दिया,
सरहदों को नाम दे कर भाई-भाई को लड़ा दिया।

आज का संसार देखता हूँ तो लगता है,
काश ये शब्द ना होते तो हम कम से कम इंसान होते,
जैसे भी होते एक-साथ होते।
काश ये शब्द कभी बने ही ना होते।

✍️Sandeep Joshi✍️

शायराना दिल

लुत्फ़-ए-मुसलसल इस किस्मत में कहाँ,
ना-मुकम्मल ही वो दास्तां-ए-इश्क़ रही,
ख़ुद को पूरा करने निकले थे जो हम यहाँ,
इश्क़-ए-बरबाद ने जो थोड़ा थे वो भी ना छोड़ा।

✍️Sandeep Joshi✍️

शायराना दिल

कहानी में हमारी बस इतनी कमी रह गई,
मैं सही वक़्त का इंतज़ार करता रह गया
और वो वक़्त के साथ सही होते गए।

✍️Sandeep Joshi✍️

मेरी आवाज़

मेरी आवाज़ मुझ पर ही पलट कर बरस जाती है,
ये खुशकिस्मती है या सज़ा समझने में रात यूँ ही कट जाती है।

कहने को बहुत है पर सुनाये किसको,
ऐसे ही ख़ामोशी बाज़ी मार जाती है,
मेरी आवाज़ मुझ पर ही पलट कर बरस जाती है।

ज़्यादा कुछ ज़िंदगी से मांगा नहीं,
बस बचपन सी मासूमियत मांगी थी,
उसमें भी ज़िंदगी ने कंजूसी दिखायी है
और मेरी आवाज़ मुझ पर ही पलट कर बरसती आई है।

✍️Sandeep Joshi✍️

(2) Diary and my scrap: The Unknown City

I came to a city completely different from mine.
I met different people with different mindsets. This unknown city gave me friends, love and even took them away from me and what I end up with is becoming unknown again.

But what I learnt is you have to become unknown to be known to yourself.
Once you understand that you are the driver of your life you’ll never feel the need of someone to make you understand how to drive your life.

“We meet people we think we’ll be with forever but what’s true is they’ll be with us, but physically or in our memories is something uncertain”.

✍️Sandeep Joshi✍️

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